मंज़िलों की आरज़ू…



मंज़िलों तक मंज़िलों की आरज़ू रह जाएगी,
कारवाँ थक जाएँ फिर भी जुस्तुजू रह जाएगी।

ऐ दिल-ए-नादाँ तुझे भी चाहिए पास-ए-अदब,
वो जो रूठे तो अधूरी गुफ़्तुगू रह जाएगी।

ग़ैर के आने न आने से भला क्या फ़ाएदा,
तुम जो आ जाओ तो मेरी आबरू रह जाएगी।

इस भरी महफ़िल में तेरी एक मैं ही तिश्ना-लब,
साक़िया क्या ख़्वाहिश-ए-जाम-ओ-सुबू रह जाएगी।


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